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चकिया में सजी मासिक काव्य गोष्ठी, कवियों ने कविता और व्यंग्य से बांधा समां



चकिया (चंदौली)। नगर स्थित आदित्य पुस्तकालय में चंद्रप्रभा साहित्यिक संस्था, चकिया की ओर से मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ वरिष्ठ साहित्यकार मनोज द्विवेदी 'मधुर' ने वाणी वंदना "तेरी कृपा से गूंगा बोले, मंदमति वाचाल हुआ..." प्रस्तुत कर किया।


काव्य पाठ का शुभारंभ मनोज द्विवेदी 'मधुर' ने "सकल विश्व में भारत माता की हिंदी ही पहचान है" कविता से किया। धर्मेंद्र त्रिपाठी ने "कवियों की व्यंजना में, दुखियों की वंदना में, साधक की साधना में, माता तेरा वास हो" सुनाकर सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।


राजेश विश्वकर्मा 'राजू' ने "काली घटा घनघोर घेरी के उमड़-घुमड़ के आओ, बदरवा अब न जिया तरसाओ" के माध्यम से प्रकृति का मनोहारी चित्रण किया। बंधु पाल 'बंधु' ने जल संरक्षण पर आधारित अपनी रचना से लोगों को जागरूक किया। प्रदीप पाठक ने समसामयिक विषयों पर व्यंग्य प्रस्तुत किया।


मनोज द्विवेदी 'मधुर' ने "कवियों को हो गई है लाइलाज व्याधियां, रेवड़ी की तरह बांटते मानद उपाधियां" सुनाकर साहित्य जगत की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य किया। अलियार प्रधान ने "रो रहे को हंसाने की कोशिश करो, हंस रहे को हंसाने से क्या फायदा" जैसी प्रेरणादायी पंक्तियों से श्रोताओं की सराहना बटोरी।


राजेंद्र प्रसाद जूनियर ने "अब सुर की बात नहीं, बेसुरों का जमाना है" के माध्यम से वर्तमान सामाजिक परिवेश पर कटाक्ष किया। हरिवंश सिंह 'बवाल', जगजीवन, रामप्रवेश 'झाऊ', गौरी शंकर मौर्य, मिथिलेश सिंह सहित अन्य कवियों ने भी अपनी-अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।


कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार बंधु पाल 'बंधु' ने की, जबकि संचालन हरिवंश सिंह 'बवाल' ने किया। गोष्ठी में उपस्थित साहित्यकारों एवं श्रोताओं ने काव्य पाठ का भरपूर आनंद लिया।

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